Monday, December 14, 2009

घूँट घूँट जीना


परिचय - सच का सामना  

करीब ३० साल पहले, कालेज के दिनों में एक  कड़वी चीज से  दोस्तों ने परिचय कराया . उसका नाम है शराब .
घर  पर रुढ़िवादी माँ  बाप  इसे  बुरा समझते   थे. पर  पुराने पियक्कड़ो ने इस नए नए इन्जीरेअरिंग कालेज के  बकरे को तरह तरह से उकसाया और ललचाया . पुराने  खिलाडियों और सीनिअरो   के मजाक उड़ाने के डर से इस कडवाहट को पीकर  हम ऐसा दिखाते रहे मनो ये कोई अमृत है. मगर मैं  इससे दोस्ती न कर सका ठीक से.  

कई साल बाद जब मैं  जब भारतीय सेना में  अफसर की हैसियत से शामिल हुआ, तब  मुझे शराब  का असली  लुत्फ़  लेना आया. जब सोचता हूँ तो इस बदलाव के कई कारण नजर आते है -

१. पूर्वाग्रह नहीं - हालाँकि सामान्य धारणा के विपरीत भारतीय सेना में बहुत से लोग शराब नहीं पीते, पर शराब
 को लेकर यहाँ सिविलियनों की तरह पूर्वाग्रह नहीं हैं. 'शराब बुरी है' या 'शराब के बिना भी कोई जिंदगी है' -इस तरह के दो खेमों में न बट कर शराब को सहजता से जिंदगी में स्वीकारते है -पीने वाले भी और ना पीने वाले भी.
२.धीरे धीरे पीना - गिलास पकड़ते ही तेजी से हलक में ठूंसने के बजे यहाँ इसे अधितर लोग बड़े आराम से पीते हैं.
३.पानी  या सोडा ?- अधिकतर लोग शराब की कडवाहट को कम करने के लिए इसमे  कुछ मिला कर पीते हैं .'नीट' और 'कोकटेल' पीने वाले भी हैं पर चुनिन्दा.
४.चुनाव- अपना 'जहर' खुद चुनने का मौका यहाँ ज्यादा है .
५.शराब तो बहाना है बस पार्टी मानना है - दिन भर की थकान के बाद (कभी  कभी इसके बीच) जब मौका मिला पार्टी मना  डालते है कोई बहाना ढूंढ कर. अगर कोई भी न मिले तो 'जाम' ही साथी है.

आज जब सेना से रिटायर्मेंट लेकर लेखक बनने का फैसला किया है तो एक सवाल ने काफी परेशान किया - 'सच लिखें या मन की?
'जिंदगी में सच्चाई अक्सर कड़वी होती है' ऐसा सुना है और अनुभव भी किया है.
तो क्या इस कडवाहट के डर से हम सच से आंखे चुराकर जीने लगें या इस कड़वी दवा को पीकर अपना मुंह बिगाड़ते रहें?
इस सच की कड़वाहट से निपटने के लिए मैंने वही फ़ॉर्मूला लगाने की सोची है जिससे मैंने शराब का मजा लेना सीखा.
इस ब्लॉग पर मैं अपने छोटे छोटे कड़वे सच्चे अनुभवों को मजा लेकर धीरे धीरे  लिखूंगा .
 इसमे सच के कड़वे अंश भी होंगे और कल्पनाओं की मीठी उडान भी.
अब तो घूँट घूँट जीना है .

2 comments:

  1. Deepak I have seen your Hindi blog
    It apears that you have an in built writer in you.that is OK. What are you doing for your bread? Pension only? can you manage? if you can it is wonerful. All the best.

    ReplyDelete
  2. दीपक जी, आपने बिलकुल ठीक कहा : ज्यादती हर चीज़ की बुरी होती है .
    एक ग़ज़ल भी है - थोड़ी थोड़ी पिया करो !

    ReplyDelete