Thursday, April 1, 2010

ये आइडिये आखिर आते कहाँ से हैं !

मेरे एक मित्र श्री विजय कुमार तायल ने फोन कर मेरी ब्लॉग की एक पोस्टिंग की तारीफ की और साथ में एक सवाल भी जड़ दिया , 'यार, ये सब लिखने के लिए तुम्हें आईडिया आते कहाँ से हैं ?

मैंने उस वक्त तो उनसे कह दिया कि 'ये तो मेरा ट्रेड सीक्रेट है' , पर बाद   में सोचा ,' अरे ,ये सवाल भी तो अपने आप में एक आईडिया है और क्यों न इसी पर एक ब्लॉग पोस्टिंग लिख दी जाय .

एक लेखक या कलाकार को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए आईडिया  का होना लाइफ लाइन या प्राण की तरह है. नए नए आईडिया मिल जायें तो टोनिक का काम करते हैं और एक कलाकार सब कुछ भूल कर अपनी crativity
के द्वारा उसको एक सुन्दर रूप दे डालता है जो अक्सर सराहा जाता है.

पर सवाल तो आखिर यह है कि आईडिया जन्म कैसे लेते हैं एक कलाकार के दिमाग में. मेरे अपने व्यक्तिगत अनुभव और विचार मैं यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ-

captions और one - liners - कहीं अपने कोई caption लिखी देखी या किसी से कोई one liner dialiogue सुना जो आपके मन को भा गया. बस मिल गया आपको एक टॉपिक लिखने को. अभिनेता अक्षय कुमार ने एक बार एक interview में कहा था कि उसने एक ट्रक के पीछे लिखा देखा 'Singh is king ' और सोच लिया कि वह इसी title ओर theme पर फिल्म बनायेगे और कई सालों की मेहनत के बाद अपना सपना सच कर दिखाया.

सवाल जो चुभ जाये या मन को हिला दे -किसी ने आपसे सवाल किया जो आपको विचलित कर दे. बस दिमाग में एक स्पार्क होता है और आईडिया हाजिर हो जाता है. ठीक वैसे ही जैसे एक सवाल ने मुझे ये ब्लॉग पोस्टिंग लिखने को मजबूर कर दिया है.

समस्या - आपकी किसी समस्या से मुलाकात हुयी (चाहे वो अपनी हो या किसी और की ), बस दिमाग का मीटर चालू हो जाता है. उस समस्या के समाधान का आपका नजरिया क्या है वह आपकी रचनाओं में प्रतिबिंबित होने लगता है.    

भावनाए - इस छोटे से दिल में हर कोई अनगिनत भावनाएं छुपा कर रखता है. लेखक वह प्राणी है जिसको इन में से कई भावनाओं को जाहिर करने का सम्मानित मौका  मिल जाता है.

प्रेरणा -अपने कोई किताब ,कहानी या लेख पढ़ा और उस से आप प्रभावित हो गए. बस अपने उस (एक या कई) प्रस्तुती को अपने अंदाज में ढाल कर (या फिर खिचडी या cocktail बना कर) अपना नाम दे डाला. ये remixing का जमाना है भाई.

मुकाबला - 'उसकी साड़ी मेरी साडी से सफ़ेद कैसे ?' कई बार रचनाये प्रतिस्पर्धा की भावना से भी रची जाती है. यहाँ दूसरे से बेहतर लिखने का जज्बा इतना तीव्र होता है कि जो भी बात उस वक्त दिमाग में पहले आती है उस पर अपनी कलाकारी के जौहर  दिखाकर एक रचना तैयार हो जाती है.

मजबूरी- लेखक एक इंसान भी है और उसे भी पापी पेट को पालना है.  इसलिए वह बिचारा कभी कभी जो बिकता है वो लिखता है.  ऐसे में idea  लेखक के दिमाग से नहीं बल्कि जनता जनार्दन की मर्जी से आते हैं  .

अंत में यह भी लिखना चाहूँगा कि लेखक बनाने से पहुत पहले से  मैं एक बहुत बड़ा पढ़ाकू भी हूँ. पढ़ाकूपन की इस दीवानगी  और प्यास में मैंने  औरों के द्वारा रची हुयी हजारों रचनाओं का स्वाद लिया है.  इन्ही पसंदीदा  रचनाओं में से मुझे कई आईडिया मिल जाते हैं.  अगर कभी आईडिया के इस खजाने में कोई कमी महसूस करता हूँ तो नयी नयी किताब, ब्लॉग या मैगजीन पढ़ता हूँ, फिल्म देखता हूँ गूगलिंग करता हूँ या जो भी  इंसान मिलता है उससे बतियाता हूँ.

 ideas  तो बिखरे पड़े है हर जगह ,पर हमें अपने antenna  को tune  up  करना पड़ता है अपने हिसाब से उन्हें ग्रहण करने के लिए  .

चित्र -आभार freeimages  

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