Monday, September 20, 2010

ई ऍम आइ का मकडजाल

उधारपति जी मेरे सहपाठी रह चुके हैं. मेधावी और कर्मठ रहे हैं. जब हमारी मित्र मंडली के अधिकांश लोग पढ़ाई पूरी करके इधर उधर नौकरी के लिए खाक छान रहे थे, उन्होंने वकालत में अपनी धाक जमा कर अच्छी कमाई भी शुरू कर ली थी. कई सालों बाद आज अचानक उनसे भेंट हुई. उनकी (आर्थिक) हालत देख कर आश्चर्य हुआ. कई ई ऍम आइ के बोझ तले उन्हें दबे देख ‘पीपली लाइव’ का वो गाना याद आ गया , ‘सखी सैयां तों खूब कमात हैं , महंगाई डायन खाए जात है ...’

उधारपति जी अकेले ही उधारी मैं जिंदगी काट कर अपना नाम सार्थक नही कर रहे, उन जैसे लोग मिलना आजकल आम हो गया है. उदारीकरण, प्लास्टिक मनी और इ- बैंकिंग ने जहाँ एक ओर हमारी जिन्दगी को सरल बनाया है वहीं उधार के दलदल में भी धकेल दिया है.

उधार के दम पर अपनी इच्छा पूरी करते वक्त छोटी सी इंस्टालमेंट को मेनेज करना आसान लगता है पर लंबे समय तक इन छोटी छोटी इंस्टालमेंट को झेल पाने का बूता अच्छे अच्छों में नहीं दिखता. उधार की मार से बचने के लिए दूसरा उधार लेकर हम इस मकड जाल में फंसते ही जाते है.

मैंने कहीं एक प्रयोग के बारे में पढ़ा था जिसमे किसी ने जब एक मेंढक को उबलते पानी में डाला तों वह एकदम उछल कर जान बचाने के लिए बाहर कूद पड़ा. पर जब उसी मेंढक को जब पानी की कढाई में डाल कर धीरे – धीरे पानी गर्म किया गया तों उसने बाहर निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और अपनी मौत की तरफ आराम से सरकता गया और अंत में उबलकर मर गया. शायद मरने से पहले उसने बड़े हाथ पैर पटके होंगे बाहर निकालने के लिए ,पर तब तक वह इतना कमजोर हो चुका था कि बाहर तक छलांग मरने की जान ही उसमें नहीं बची थी.

उधार देने वाली संस्थाये इसी गुरु मन्त्र का इस्तेमाल करके आम आदमी को खून चूस डालते हैं और उसे पता भी नहीं चलता. सदियों से सूदखोर महाजन गांवों और कस्बे में गरीबों को ठग रहे थे पर अब ये बीमारी शहरों तक जा पहुँची है और पढ़े लिखे और संपन्न लोगोंको भी नहीं बक्श्ती. अब तो इसमें सब कुछ आधुनिक कम्पूटर और इंटरनेट के माध्यम से होता है.

पर इसमें जितना हाथ उधार देने वाली संस्थाओं का है उतना ही दोष उन लोगों का है जो लालच,अज्ञान और भावावेश में आकर अपनी क्षमता से कहीं अधिक का उधार उठाने का प्रयास करते हैं और फिर फिसलते ही जाते हैं.

मैं तीन तरह के लोगों का जिक्र करना चाहूँगा जिनमे से किसी न किसी (एक) वर्ग में आप जरूर होंगे-

१. आप पर अभी कोई उधार नहीं है – यकीन मानिये ,आप चंद गिने चुने भाग्यशाली लोगों में है जो आज के दौर में मुश्किल से मिलते है. अगर कोई विशेष दबाब या मजबूरी न हो तो अपने इस वी आई पी स्टेटस को हाथ से न जाने दें. अगर किसी मजबूरी के चलते उधार लेना ही पड़े तो इससे जुड़े हर पक्ष ,हर पहलू की जाँच कर ले. आपकी जानकारी के दायरे में जो लोग उस तरह का उधार ले चुके हैं उनसे आत्मीयता से खुल कर बातें करे और मन में उठ रहे हर सवाल का हल जानने की कोशिश करें चाहे इसके लिए आपको किसी प्रोफेशनल की सेवाएं क्यो ना लेनी पड़े या कुछ खर्चा ही क्यो ना करना पड़े. उधार की रकम उतनी ही रखें जितनी आपकी वास्तविक जरूरत है और जितना आप आसानी से वापस कर सकते हैं (अपनी अन्य जरूरत पूरी करने के बाद). इस बात को अधिक महत्त्व न दें कि आपको उधार कितना मिल सकता है.

२. आप पर उधार है पर आप आसानी से उसे चुका रहे हैं – आप भी भाग्यशाली है कि उधार को चुकाने में आपको परेशानी का सामना नहीं करना पडता. पर अगर उधार लंबे समय के लिए है तो कम से कम आपके पास ३ से ६ महीने तक की ई ऍम आइ चुकाने और बिना आमदनी के घर चलाने के पैसे इमरजेंसी के लिए अलग रखे होने चाहिए और इन्हें किसी भी और कारण के लिए नहीं इस्तेमाल करना चाहिए. अनिश्चितताओ के इस दौर में न तो कोई नोकरी स्थाई रही है और न ही कोई ऐसा व्यापार जहाँ हमेशा निश्चित आमदनी की गारंटी हो. किसी नए उधार को जहाँ तक संभव हो टालने की कोशिश करें. अगर संभव हो तो किसी ऐसी बचत योजना में सिलसिलेवार निवेश पर विचार करे जिससे आपको आयकर में भी राहत मिले. रकम चाहे छोटी ही क्यों न हो पर जैसे इंस्टालमेंट में हम आसानी से उधार चुका सकते हैं वैसे ही छोटी छोटी इंस्टालमेंट जोडकर एक बड़ी रकम बचा भी सकते हैं बस जरा सा धीरज और हिम्मत चाहिए पहल करने की.

३. आप पर काफी उधार है और उसी को चुकाने के चक्कर में जिंदगी बेमजा हो गयी है –आप सही मायने में एक आम आदमी हैं. हममे से अधिकतर लोग एसी वर्ग में आते हैं. अभिमन्यु की तरह आप उधार के इस चक्रव्यूह में घुस तो गए हैं और जैसे तैसे टिके भी हुए हैं, पर बाहर निकालने का कोई रास्ता आपको नज़र नहीं आ रहा. पर हिम्मत न हारे , आप २१ वीं सदी में है, महाभारत युग में नहीं. आज का अभिमन्यू अर्जुन से वीडियो चेटिंग करके रास्ता पूंछ सकता है और जरूरत होने पर खुद अर्जुन को चार्टर्ड प्लेन से बुलाया जा भी सकता है. सही जानकारी हासिल करना अब इतना मुश्किल नहीं.



सबसे पहले अपनी स्थिति का सही आकलन करें. अगर आंकडे और गणित आपको परेशान करते हों तो किसी ऐसे मित्र या सहयोगी को ढूंढ कर साथ बैठे जो इन सब में आपका मददगार साबित हो सके. इन सवालों के जबाब लिख कर रखें-



आप पर कुल कितना उधार है ? इसमे कितना ब्याज है और कितना मूलधन ?

उसकी ई ऍम आइ कितनी बनाती है ?

आपको घर चलाने के लिए कितना पैसा चाहिए? क्या इसमें कोई कमी की गुंजाईश है ?

क्या आप अपनी आमदनी को बढ़ाने के किसी विकल्प पर काम कर सकते है ?



अगर आप अपनी मौजूदा आमदनी में से घर खर्च और ई ऍम आइ दोनों का बोझ नहीं उठा सकते तो इन विकल्पों पर भी विचार करें-



क्या आपके पास कोई ऐसी चीज़ है जिसे गिरवी रख कर या बेच कर कुछ रकम जुटाई जा सकती है? आजकल शेयर,सोना,गहने,जमीन,गाड़ी वगेहरा को बेचना या गिरवी रखना इतना आसान हो गया है कि कोई भी इसे आसानी से कर सकता है .दलालो के चक्कर में पडने कि बजाय किसी प्रतिष्टित संसथान की मदद लें और सौदे से पहले सारी बातें साफ़ साफ़ कर लें.

क्या आप किसी मित्र या संबंधी से बिना अपने रिश्तों में कडवाहट लाए कुछ रकम निश्चित अवधि के लिए मांग सकते हैं? इस तरह आपका ब्याज का बोझ कुछ हल्का हो जायेगा पर इसको भी बैंक लोन की तरह ही चुकाने का प्रयास करे चाहे यह वापस मांगने का तकाजा हो या न हो.



उधार चुकाने के लिए उधार लेना कोई स्वस्थ रास्ता नहीं है पर अगर और कोई विकल्प नज़र न आये तो इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और इस लोन का फार्म भरने से पहले से पहले ध्यान से पढ़ ले और ‘शर्ते लागू है’ जैसे गोल मोल बातों का स्पष्टीकरण लेकर अपनी तसल्ली कर ले. आजकल लोन बड़ी आसानी से मिल जाते है पर उनको चुकाने का अनुभव बड़ा चुनोतीपूर्ण और झंझट भरा होता है.



उधार की दलदल में अगर आप फंस ही गए हैं तो हाथ पैर तो मारने ही पड़ेगे पर घबराकर मारे गए हाथ पैर जहाँ आपको और अंदर घसीटेंगे वहीं सोच समझ कर किया गया प्रयास आपको किनारे ला सकता है. ऐसे में अगर कोई बाहरी सहायता मिल जाय तो क्या कहने.

चित्र साभार 
http://www.bigfoto.com/

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