Sunday, November 22, 2015

फिल्म और योगी


योग को फिल्मो के माध्यम से भी समझा जा सकता है. कई फिल्में एक योगी का द्रष्टिकोण समझाने का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती है.

जैसे पिछले दिन रिलीज़ हुई सलमान खान की फिल्म बजरंगी भाई जान को ही लें. इसमें बताया है कि देश की सीमाओं से परे जाकर भी सोचा जा सकता है. एक योगी दो विरोधी से दिखने वाली शक्तियों को पूर्णता की द्रष्टि से देखते हुए सम्द्रष्टि का भाव रखता है. दूसरों /समाज द्वारा बनाई गयी सीमाओं का वह आदर तो करता है पर उनके मकडजाल में फंस कर इंसानियत को नहीं भूलता.

 हालांकि इसमें निर्देशक ने अपना द्रष्टिकोण एक गूंगी बहरी बच्ची के माध्यम से रखा है जो निरीह जनता का प्रतिनिधित्व करती है, परंतु एक योगी भी इसी तरह की सोच रखता है. अंतर इतना है कि योगी मूक बघिर नहीं होता वह तो स्वतंत्र होता है अपने जीवन में हर तरह के चुनाव करने का और  हर परिस्थिति में सहज  चुनाव कर आनंद से रहने का.

देश की सीमाएं हमें बांधती है और इनका एक दायरा है, हालांकि इनसे बहुत से लाभ भी है. देश के कई सरकारी अफसर हुक्मारान  और देशवासी अपनी सीमाओं में बंधे होते है जिनका शरारती तत्व हमेशा फायदा उठाते है इन्हें भड़का कर अपना उल्लू सीधा करते हैं.

क्या वह दिन आएगा जब देश की सीमाएं हमें अतिवादी  ना बना कर जीवन में सहयोग करेंगी? विज्ञान और टेक्नोलॉजी तथा नई उम्र की नई सोच और आजके बच्चे इनमें शायद इस संभावना को सत्य करने की सामर्थ्य है.

 इसी तरह आमिर खान द्वारा अभिनीत फिल्म पीके इसी तरह धार्मिक विचारों से ऊपर उठकर सोचने को मजबूर कर देती है. इसमे निर्देशक ने एक एलियन (दूसरे गृह का वासी) के माध्यम से अपने विचारों को प्रकट किया है और हार धर्म में फ़ैली कुरूतियों पर आघात किया है .
एक योगी की सोच भी इससे मिलाती जुलती होती है. वह हर धर्म का आदर तो करता है पर धर्म के नाम पर दकियानूसी और बेतुकी परम्पराओं में नहीं उलझता . उसके लिए सबसे बड़ा धर्म मानवता होता है जिसे वह हर हाल में निभाता है.


धन्य है हिन्दुस्तानी फिल्मे जो हमें ग्लैमर के तड़के के साथ बड़ी चतुराई से एक योगी का द्रष्टिकोण भी परोस देती हैं . अब हमें इसमे से क्या ग्रहण करना है यह तो हमारी इच्छा पर ही निर्भर करेगा.

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