Sunday, October 7, 2018

मोह


मोह न होता इस काया से तो मैं क्यों
 इस बीमारियों की गठरी को उठाता ?

मोह न होता अगर इस घर से तो मैं क्यों
इस चार दीवारों और एक छत के नीचे इतराता ?

मोह न होता इस कुनबे से तो क्यों मैं क्यों
इतना झगड़ा करने के बाद भी अपना कहलाता ?

मोह न होता इस देश  तो क्यों मैं क्यों
इस आपाधापी में भी सुकून पाकर इतराता ?

मोह न होता इस दुनिया से तो मैं तो स्वर्ग सिधार जाता
और लोग मजा लेते , किसी के बाप का क्या जाता ?

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