Sunday, May 25, 2014

उधार का चक्कर

   मोबाइल पर SMS आने की बीप ने उसके ख्यालों का सिलसिला तोड़ दिया . लाइफ इंशुरन्स के प्रीमियम बैंक खाते से दिए जाने की सूचना थी वह. भला हो इस टेक्नोलॉजी का , जिन्दगी कितनी आसान कर दी है इसने आजकल. पर ये क्या? अपने बैंक खाते में बैलेंस की रकम देख कर वह चोंक गया. आज तो १२ तारीख ही है. कितना सारा महीना अभी बाकी है. कैसे मैनेज होगा?
रमन यूँ तो अच्छी तनखाह पाता था और पहले घर खर्च बड़ी आसानी से निकल जाता था और थोड़ी बहुत बचत भी हो जाती थी, पर जब से उसने पर्सनल लोन लिया था तब से लगता है वह एक अंतहीन चक्र में फंसता जा रहा है.एक दलदल सी थी जिसमें से वह जितना हाथ पैर निकालने के लिए मारता उतना ही और धंसता नजर आता था.
   अभी २ साल पहले की तो बात है ,सब कुछ कितना अच्छा चल रहा था. घर, नौकरी ,ज़िंदगी . वह बड़ा खुश था. पर अलका के साथ हुए उस दुर्घटना ने जैसे सब कुछ बदल कर रख दिया. उनकी ज़िन्दगी में खुशियों पर जैसे ग्रहण लग गया. शरीर पर लगे जखम तो अस्पताल की मदद से समय के साथ भरते चले गए औए अब तो जख्मों के निशाँ भी गायब होने लगे थे. पर एकदम से ओपरेशन का बिल चुकाने हे लिए उसने जो भरी लोन ले लिया उसके मकड़ जाल से वह निकल नहीं पा रहा था. लोन हासिल करने के लिए तो कितनी भाग दौड़ इतने कम समय में की थी उसने और कितनी तड़प थी उसके मन में उसे हासिल करने की पर अब उसी ताकत से वो इससे उबर क्यों नही पा रहा है.
   उस वक्त तो जो भी कागज बैंक की तरफ से उसकी तरफ आगे बढाया गया उसने आंख मींच कर साइन कर दिया .पढ़ने के लिए ना तो उसके पास समय था और न ही मन. पर आज जो कुछ उससे वसूला जा रहा था उस सब की लिखित स्वीकृति उसने खुद ही तो दी थी . पर मान लो अगर वह इन सब शर्तो के बारे में उस वक्त पढ़ भी लेता तो क्या साइन करने से मन करने की स्तिथि में था?
उसके बाद से उसे easy money मनी की जो आदत पड़ गयी वो खतरनाक थी . और कितने ही लोन और टॉप अप लोन के जाल में फंसता चला गया. 
   उसे मदर इंडिया फिल्म का बिरजू याद आया. फिल्म में साहूकार बिरजू से हार साल उसकी फसल के तीन हिस्से सूद में ले लेता है फिर भी सूद बढ़ता जाता है और मूलधन जो एक मामूली सी रकम थी  वो तो अपनी जगह पर बनी ही रहती है.
  ये उसकी पसंदीदा फिल्म थी जिसे उसने कई बार देखा था . वो अब तक फिल्म के सूदखोर साहूकार को कोस कर खुश हो जाता था और सोचता था कि वो तो बिरजू की तरह अनपढ़ और गंवार नहीं है बल्कि २१ वी सदी का पढ़ा लिखा आधुनिक इंसान है पर अब उसे अहसास हो रहा था की जमाना बहुत बदला नहीं था और उसकी हालत भी किसी बिरजू से कम खराब नहीं थी , बस वो गाँव में न होकर शहर में था यही अंतर था.
   उधार के इस चक्रव्यूह से बाहर आने का वह प्रण करता है और साथ ही यह भी निश्चय करता है कि औरों को भी इस तरह से फंसने से सावधान करेगा.
ईश्वर उसकी मनोकामना पूर्ण करे.


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