Saturday, December 29, 2018

हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति : वैश्विक परिदृश्य

बद्रुका कालेज ,हैदराबाद में १४/१५ दिसम्बर को एक दो दिन का अंतर्राष्टीय सम्मलेन हुआ जिसमें मुझे भी अपना शोधपत्र प्रस्तुत करने का अवसर मिला। इन शोधपत्रों को मिलिंद प्रकाशन ने एक पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया है. शोधपत्रों केसार  को भी स्मारिका में प्रकाशित किया गया।






Monday, December 24, 2018

घड़ी

 नये क्षितिज पत्रिका में मेरी एक रचना 'घड़ी' प्रकाशित हुयी


हिंदी भूषण श्री सम्मान

के बी साहित्य समिति , बदायूं (उ. प्र.) द्वारा  १८ दिसम्बर को मुझे यह सम्मान प्राप्त हुआ





Wednesday, December 5, 2018

आज में सठियाने लगा हूँ

(अपने साठवें जन्मदिन पर)


इस बार के जन्म दिन पर
और दिलकश मैं नजर आने लगा हूँ
सीनियर सिटीजन क्लब में एंट्री पाने चला हूँ      
आज में सठियाने लगा हूँ

साठ बसंत देख लिए
साथ में और कितने ही मौसम भी रंग भी
मौत के नजदीक अब और मैं आने लगा हूँ
आज में सठियाने लगा हूँ

घड़ी कलेण्डर के बंधनों से आज़ाद होकर
मस्त होकर जीना सीख लिया है
वक्त  से ऊपर कही जाने लगा हूँ
आज में सठियाने लगा हूँ

शायरी का शौक पाल लिया हमने अब
सब समझते हैं कि मैं बडबडाने लगा हूँ
रात दिन कविता ग़ज़ल गाने लगा हूँ
आज में सठियाने लगा हूँ

खुद को नहीं है होश
क्या कहे जा रहा हूँ में बेखबर
बिन पिये ही आज लड़खड़ाने लगा हूँ
ये किधर मैं अब जाने लगा हूँ
आज में सठियाने लगा हूँ

बहरा है क्या?

आदत से मज़बूर

Tuesday, November 20, 2018

काव्य रत्नावली

अमृतधारा संस्था द्वारा प्रकाशित 'काव्य रत्नावाली ' संकलन में मेरी कवितायेँ भी प्रकशित हुईं।इसका  लोकार्पण जलगांव में  एक भव्य समारोह में हुआ.







Tuesday, November 6, 2018

सुख में सुमिरन


संत कबीर का एक दोहा है- दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय, जो सुख में सुमिरन करें तो दुःख कहे को होय.
इसमें बताया है कि लोग दुःख या कष्ट आने पर ही भगवान को याद करते हैं या उनका का स्मरण (सुमिरन) करते है और कष्ट की अवस्था जाते ही फिर भूल जाते है. पर अगर यही काम (प्रभु-स्मरण) सुख की अवस्था में किया जाय तो कष्ट की स्थिती ही नहीं आयेगी. 
यही बात योग के बारे में भी सही उतरती है. लोग अक्सर अपनी किसी कष्टप्रद समस्या जैसे मोटापा, तनाव या निराशा आदि को दूर करने के लिए योग करना चाहते हैं जैसे योग कोई दवाई हो. पर कितना अच्छा हो अगर यही लोग योग को अपनाने के लिए किसी कष्टपूर्ण स्तिथि के आने की प्रतीक्षा न करें बल्कि स्वेच्छा से इसमें उतारकर अपने स्वास्थ्य को बनाये रख सकें.

Saturday, October 27, 2018

सांस तू बोर नहीं होती



आती है जाती है
रुकने का नाम नहीं लेती
इस बोझिल कवायत से
सांस तू बोर नहीं होती 


आने जाने के सिवाय
कुछ नया काम तुझे मिलता है या नहीं
एक सा काम किये जाती है
सांस तू बोर नहीं होती 

एक सा काम किये जाने पर
में तो बड़ी जल्दी बोर हो जाता हूँ
तेरा मिजाज़ कुछ अलग है तभी तो
सांस तू बोर नहीं होती 

तेरे ठहर जाने के बारे में
तू तो नहीं सोचती पर मैं
सोच सोच कर अक्सर डरता हूँ
क्या मेरे डरने के डर से
सांस तू बोर नहीं होती 

इस मतलबी दुनिया में
दिल की धड़कन की तरह
तू मेरी सच्ची मददगार है
वर्ना क्यों ऐसा होता है कि
सांस तू बोर नहीं होती 

Sunday, October 7, 2018

मोह


मोह न होता इस काया से तो मैं क्यों
 इस बीमारियों की गठरी को उठाता ?

मोह न होता अगर इस घर से तो मैं क्यों
इस चार दीवारों और एक छत के नीचे इतराता ?

मोह न होता इस कुनबे से तो क्यों मैं क्यों
इतना झगड़ा करने के बाद भी अपना कहलाता ?

मोह न होता इस देश  तो क्यों मैं क्यों
इस आपाधापी में भी सुकून पाकर इतराता ?

मोह न होता इस दुनिया से तो मैं तो स्वर्ग सिधार जाता
और लोग मजा लेते , किसी के बाप का क्या जाता ?

Monday, September 24, 2018

शादी का लिफाफा (रचनाकार.ऑर्ग पर यह रचना प्रकाशित हुई है ।)



Tuesday, September 18, 2018

प्रेम गीत गाओ (रचनाकार.ऑर्ग पर यह कविता प्रकाशित हुई है



ब्लेकमेलर


नवल से मेरी मुलाकात एक अरसे बाद अचानक एयरपोर्ट लॉउन्ज पर हुई। मेरी फ्लाइट चार घंटे लेट थी और वह अपनी गाड़ी के आने का इंतज़ार कर रहा था। उससे मिल कर कालेज के दिन याद आ गए। कितना धमाल मचाते थे हम सब मिल कर। वह ज़िद करके मुझे अपने घर ले गया । मुंबई की एक पॉश कॉलोनी में आलीशान घर था उसका। उससे मिल कर पता लगा कि एक बड़ा बिल्डर बन चूका था वो।
फिर उसके घर आने जाने का सिलसिला शुरू हो गया और में उसके घर का सदस्य जैसा बन गया। एक दिन वह जब घर पर नहीं था और में उसके घर पर उसका इंतजार कर रहा था तो उसके ऑफिस के एक कर्मचारी को किसी को धमकाते हुए सुना। वह पैसे कि मांग कर रहा था जिसे संरक्षण धन यानि प्रोटेक्शन मनी की संज्ञा दे रहा था। मैं गलती से उस कमरे में आ गया था और उस व्यक्ति कि पीठ मेरी और होने की वजह से उसे मेरी उपस्थिति का आभास नहीं था। अब मेरी समझ में आने लगा था की नवल इतनी जल्दी इतना अमीर कैसे बन गया था।
मुझे याद आया कालेज के उन दिनों दिनों की घटनाएं जहाँ नवल अक्सर अपने साथ माचिस की एक डिब्बी में मरी हुयी मक्खी या कीड़ा रखता था और रेस्टोरेंट में खाना खाकर किसी भी प्लेट  में उस मरे हुए जीव को डाल कर इतना हंगामा खड़ा कर देता था कि रेस्टोरेंट के मालिक को बदनामी से बचने के लिए बिना बिल भरे ही जाने को मजबूर कर देता था। कई शहरों और कई  रेस्टोरेंट और मिठाई कि दुकान पर उसने यह रामबाण नुस्खा सफलता से चलाया था और उसके सब यार दोस्त इसमें मजा लेते थे। पर वो तो कालेज के दिन थे और ऐसी बातें कुछ अजीब नहीं लगाती थीं। पर नवल ने तो लगता है अपनी उसी कमीनी आदत को अपना धंधा बना डाला था।
नवल के माँ बाप का उसके बचपन में ही एक दुर्घटना में देहांत हो गया था और उसको  उसके एक शराबी  मामा ने निर्दय से प्रताड़ित करते हुए बड़ा किया था।
मैंने सोचा ,'काश उसको भी कालेज के दिनों में कोई रोकने टोकने वाला होता तो आज वह एक ब्लेकमेलर न होकर एक सभ्य नागरिक होता।'

Friday, September 7, 2018

योगी का जीवन



योग की घटना के अहसास के बाद मनुष्य के जीवन में विशिष्ट परिवर्तन होते हैं जिनमें मुख्य हैं
-सोच में स्पष्टता
-उपलब्ध विकल्पों का चयन बेहतर
-किसी भी परिस्थिति में संतोष से आनंद पूर्वक रहना
एक सच्चा योगी वह व्यक्ति है जिसने समाधि या  निर्वाण की अवस्था को पा लिया है अन्यथा वह एक योग-साधक कहलाता है.
योगी हमेशा ही अपनी मस्ती में डूबा हुआ रहता है . वह मन, वचन और कर्म से एकरूपता रखता हुआ आनंदपूर्वक जीता है. ऐसा व्यक्ति समय और सामाजिक व्यवस्थाओं की सीमाओं से आज़ाद होता है पर साथ ही दूसरों के भले के लिए इन सीमाओं का मान भी रखता है.
ऊपर से देखने पर तो कोई योगी किसी भी साधारण व्यक्ति की तरह से ही खाता /पीता ,सोता/जागता या फिर बातें करता दिखलाई पड़ता है पर अगर ध्यान से देखें तो उसके व्यवहार का अंतर समझ में आने लगता है.
एक योगी केवल उन्ही बातों पर अपनी प्रतिक्रिया देता है जिससे सबका भला हो औए इससबमें वह स्वयं भी शामिल होता है. उसकी प्रतिक्रिया क्रोध या भय के कारण नहीं बल्कि नैसर्गिक और जाग्रत अवस्था की होती है. 
एक योगी को कुछ बातों से किसी आम आदमी से अलग पहचाना जा सकता है-
श्वांस अक्सर आम आदमी की स्वांस उथली (shallow) होती है जो अक्सर किसी भी एक नथुने (बाएँ या दायें) से ज्यादा ली जाती है. इसके विपरीत एक योगी की श्वांस गहरी और सम्यक (balanced & stable)होती है.
भोजन- योगी अपरिग्रह (यम) का पालन करता हुआ अपनी भूख से ज्यादा कभी नहीं खाता. वह भूखा होने पर ही खाना ग्रहण करता है ,किसी रस्म अदाई या सामाजिक अनुष्ठान का पालन करने के लिए नहीं . उसका भोजन ही उसकी औषधि  होता है जो सदैव समय और परिस्थिति के अनुकूल होता है. वह अपना भोजन धीरे-धीरे खाता है और शरीर द्वारा दिए गए संकेतों को समझकर इसे बंद करता  है .
विचार- एक योगी के विचार स्पष्ट  और सम्यक होते हैं तथा वह उनमें उलझता नहीं है. विचार-शून्य अवस्था में अपनी इच्छा से पहुँच सकता है और अपने ही विचारों का द्रष्टा बन सकता है.
भावनाएं विचारों की तरह एक योगी अपनी भावनाओं का भी द्रष्टा बन सकता है और उनसे अपने को अलग रख कर देख सकता है. वह एक  आम आदमी की तरह अपने मन में पड़ी भावनाओं में उलझ कर नहीं रह जाता  .
इच्छाएं योगी के जीवन में भी इच्छाएं होती हैं पर अधिकतर यह अपनी जानकारी के दायरे में आने वाले लोगों के भले के लिए होती है.
आनंद -एक योगी हर समय आनंद की स्तिथि में रहता है . उसकी यह स्तिथि उसकी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती है. वह एक त्योहार / उत्सव के रूप में हर समय जीवन व्यतीत करता है और ऐसा करने के लिए कैलेंडर / घटनाओं पर निर्भर नहीं करता है।
वातावरण से समन्वय- योगी के आस पास जो भी घटित हो रहा है वह उससे समन्वय व् सामंजस्य स्थापित कर लेता है. उसे ज्ञात होता है कि क्या बदलना उसके बस में है और क्या नहीं.