Thursday, December 24, 2009

कर्म ही धर्म


क्या कर्म के बिना जीवन संभव है ?

जीवन से अगर कर्म को निकाल दें तो क्या वह जीवन रह जायेगा ?

सांसो के चलने और दिल के धड़कने के अलावा एक और डोर है जो जीवन को बांधे है और वो है कर्म की डोर.

आप चाहे बराक ओबामा हों या रिक्शा चलते हों, कर्म से आपका छुटकारा नहीं. कितने ही कीर्तिमान बना कर भी नहीं .सचिन तेंदुलकर को भी एक एक  गेंद का सामना करना पड़ता है और उसकी कई बार मात भी होती है .शाहरुख़ खान और अमिताभ बचचन को भी एक एक द्रश्य की शूटिंग करनी होती है और उनकी फिल्म भी फ्लाप  होती   हैं.

हमारे आस पास के रिश्तों का जमावड़ा ,हमारी पहचान ,हमारी आमदनी सब कुछ तो हमारे कर्म पर ही आधारित है. कर्म से ही हमें अपना भाग्यविधाता बनाना संभव है.
पर क्या हम अपने कर्म के प्रति संवेदनशील हैं या फिर सोचते हैं कि-

सब चलता है

फिर कभी फुर्सत मैं सोचेंगे

इसमें सोचने कि क्या बात है

जो हो रहा है होने दो, बस जिंदगी का मजा लूटो


चित्र -आभार - freedigitalphotos

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